बस एक कदम तू भी बढ़ा ले
उमड़ रहे थे यह विचार,
कर गुजरने को बहुत कुछ
मन में जो हो रही थी हलचल
पा लेने की बहुत कुछ !
रक्त का संचार भी था
समय का साथ भी था
उम्र भी उठ कह रही थी
साथ तेरे में खड़ी हूँ |
ना तू इसको व्यर्थ कर,
सदुपयोग कर जीवन बना ले |
बस एक कदम तू भी बढ़ा ले !
हे सामर्थ तेरे रगो में
बस सोच इसको, नष्ट न कर
रण में विजय है उसकी,
जो सोच पर करता अमल है |
बस एक कदम तू भी बढ़ा ले !
हे इतिहास गवाह इसका,
महात्माओ ने संघर्षों से ,बलिदानो से
है इस पृथ्वी को है सींचा |
जो वो भी सिर्फ सोच में ही जीते,
तो आज का सूरज कैसे दीखता !
थी कर गुजरने की जो इच्छा
उसपे अमल कर संसार रचा ,
न सोच तू इतना रे बंधू
बस एक कदम तू भी बढ़ा ले
बस एक कदम तू भी बढ़ा ले ||