Saturday, 6 April 2019

" मन और मंज़िल "

चल दिया इस दौड़ में 
मन तो मेरा बच्चा था 
               करने को बहुत कुछ अच्छा था | 

                         उसने कहना चाहा "ज़रा मेरी तो सुनो "
                              परन्तु इस शोर में ,मन बेचारे की कोन सुने 
           नादान समझ अनदेखा किया 
      स्वयं को मेने धोखा दिया ,
          और चल दिया इस दौड़ में | 

                        
   चलते चलते इस शोर में 
     कहा दो पल हम यूं रुके, 
        बिना चिंतन, बिना मंथन के 
   हम छलांग लगाते चले | 

 जब थक गया यह तन, 
जब थम गया यह मन 
         तब रुकने का विचार आया, 
         तब सुनने का ख्याल आया | 

    जो बात वर्षो से दबी थी 
     उसने कहा हे बुद्धिजीव, 
       तू हमे यह कहा ले आया | 
           हम अनजान हे इस डगर से 
        यहाँ हमारा न कोई वास्ता, 
चल तू ले चल वहाँ    
 जो हमारा था रास्ता | 

            अगर सुन लिया तूने जो होता 
              तो इस अधड़  में तू न फसता | 
    जिनके साथ तू चला था ,
     कहा हे, आज वे साथी    
         अपनों  से ऊपर जो कल थे ,
          कहा रह गए वे इस भॅवर में | 

    अंत से पहले तू जो लोटा 
               अपनों को आखिर तूने जो माना, 
         हम हे अभिन्न तेरे जिगर के ,
             लेकर तुझे नया रास्ता दिखाएंगे 
          संग हम यह कारवां बढ़ाएंगे, 
          संघर्षो को हस्ते खेलते जाएंगे 
                 मंजिल को देख नयी दस्ता बनाएंगे 
                                    और एक नयी गति से जीवन का आनंद मनाएंगे  
      चल दिया में नई राह पर || 


|| मीत ||                                                                          

Sunday, 31 March 2019

" एक कदम "

बस एक कदम तू भी बढ़ा ले 
उमड़ रहे थे यह विचार,        
कर गुजरने को बहुत कुछ    
मन में जो हो रही थी हलचल 
पा लेने की बहुत कुछ !         
       
रक्त का संचार भी था          
समय का साथ भी था           
उम्र भी उठ कह रही थी       
साथ तेरे में खड़ी हूँ |            
ना तू इसको व्यर्थ कर,        
    सदुपयोग कर जीवन बना ले | 
   बस एक कदम तू भी बढ़ा ले ! 

   हे सामर्थ तेरे रगो में               
  बस सोच इसको, नष्ट न कर   
  रण में विजय है उसकी,         
  जो सोच पर करता अमल है |  
  बस एक कदम तू भी बढ़ा ले !

   हे इतिहास गवाह इसका,        
           महात्माओ ने संघर्षों से ,बलिदानो से 
        है इस पृथ्वी को है सींचा |             
     जो वो भी सिर्फ सोच में ही जीते, 
      तो आज का सूरज कैसे दीखता !

थी कर गुजरने की जो इच्छा 
 उसपे अमल कर संसार रचा ,
न सोच तू इतना रे  बंधू         
 बस एक कदम तू भी बढ़ा ले 
    बस एक कदम तू भी बढ़ा ले ||